विभाजन के बीज बोने वाली पहचान और मानसिकता को अपरिभाषित करना

हम क्या नहीं हैं, इसे स्पष्ट करके ही हम यह परिभाषित करते हैं कि हम क्या हैं।

अगर मैं अमीर हूँ, तो कुछ “लोग” गरीब भी हैं। क्या मैं उदारवादी हूँ या रूढ़िवादी? पुरुष या महिला? इंट्ोवर्ट या एक्स्ट्रोवर्ट? अच्छी या बुरी? हममें से अधिकांश लोग खुद को आख़िर इन्हीं कसौटियों पर तो तोलते हैं। हममें से सबसे तुनुकमिज़ाज लोगों ने भी एक ऐसी पहचान ग्रहण कर ली है, जो बाकियों से “हटकर” होने पर आधारित है; फिर भी यह “बाकियों जैसा” होने के ठीक उलट ही है। अपनी पहचान की सीमाओं में फेरबदल करने की कोशिश करते-करते भी हम अक्सर नयी सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं। हम यह मान लेते हैं कि खुद को और बाकियों को वर्गीकृत कर लेने से एक अपरिवर्तनशील समाज के दायरे में काम करना आसान हो जाता है। मैं एक ऐसे अनोखे अंतर्राष्ट्रीय माहौल में पली-बढ़ी, जिसमें विभाजन और वर्ग मौजूद होते हुए भी उतने प्रत्यक्ष नहीं थे, जितने वे आमतौर पर अन्य समुदायों में होते हैं।

मेरा जन्म यूके में भारतीय माता-पिता के यहाँ हुआ था। एक साल की उम्र में मेरा परिवार मलेशिया शिफ्ट हो गया, जहाँ मेरे भाई का जन्म हुआ और जहाँ हमने चार साल गुज़ारे। पांच साल की उम्र में हमने एक बार फिर शिफ्ट किया — इस बार फिलीपिंस कि राजधानी मनीला में। मेरा और मेरे भाई का दाखिला एक स्थानीय अमरीकी अंतर्राष्ट्रीय स्कूल में करवा दिया गया। गर्मियों की अपनी छुट्टियाँ हम भारत में अपने मम्मी-पापा के परिवारों के साथ बिताते। हम देसी खाने का लुत्फ़ उठाते, दूसरों की हँसी छुड़ा देने वाले एक हल्के-से विदेशी एक्सेंट में अपनी मातृभाषा में बात करते, और ज़्यादा से ज़्यादा बॉलीवुड फिल्में देखने की ताक में रहते।

आज सोचती हूँ तो मुझे लगता है कि अपनी पहचान की कल्पना शायद मैंने किसी बुफे डिनर की फुल प्लेट के तौर पर की थी: मैं किसी भी पकवान को उठाकर अपनी प्लेट में रख सकती थी, फिर भले ही वे पकवान एक-साथ कितने भी “बेढंगे” क्यों न लगते हों।

मेरी ही तरह, मेरे जैसे लोगों को भी सांस्कृतिक तौर पर कुछ हटकर कहना गलत नहीं होगा — हम उस देश में नहीं रहते, जहाँ हमारे माता-पिता पले-बढ़े थे, हम कई भाषाओँ में माहिर हैं, हमने उन सांस्कृतिक मानदंडों को अपनाया है, जो स्थानीय संस्कृति, अमरीकी संस्कृति और मेरे माता-पिता की संस्कृति का एक मिश्रण हैं, व हमारे लिए “घर” जैसे शब्द का तो कोई वास्तविक अर्थ कभी रहा ही नहीं। मेरी क्लास के ज़्यादातर बच्चे मुझसे व एक-दूसरे से अलग दिखते थे, पर फिर भी हमारे बीच के “फर्क” इतने जाने-पहचाने थे कि हमारे लिए उन्होंने कभी इतनी अहमियत ही नहीं रखी।

मुझे गलत न समझें: मैं यह नहीं कह रही कि मेरी दुनिया किसी स्वर्ग जैसी थी। मुझे भी उन्हीं चीज़ों से गुज़रना पड़ा, जिनसे स्कूल जाने वाले ज़्यादातर बच्चों को गुज़रना पड़ता है: सीनियर्ज़ की दादागिरी, लोकप्रियता हासिल करने में एक-दूसरे को धूल चटाने की होड़, और रिजेक्शन। लेकिन हम अपनी ही छोटी-सी दुनिया में रहते थे, मानों हम उस दुनिया के बाहर खड़ी दीवारों से सुरक्षित हों। लेकिन यह ढाल भी बेगुज़र नहीं थी। छोटे-मोटे नस्लभेदी बर्ताव या जाहिल विचार रिसते-रिसते कभी-कभार इसके अंदर प्रवेश कर ही जाते थे।

फिलीपिंस में आठ साल बिताने के बाद हम स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोल्म में जा बसे। वहाँ मैंने अपने तब तक के जीवन के सबसे भेदभावहीन समाज को देखा: एक ऐसा समाज, जिसमें आमतौर पर सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता था। जिन-जिन देशों में मैं रह चुकी थी, उनकी आपस में तुलना करते-करते राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों में मेरी दिलचस्पी भी बढ़ने लगी थी। मैं यह जानना चाहती थी कि आख़िर ये सभी देश एक-दूसरे से इतने अलग क्यों हैं व इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है। हाई स्कूल का मेरा अधिकतम समय स्टॉकहोल्म में ही बीता — इसका इकलौता अपवाद मेरे जूनियर और सीनियर इयर का वह आधा-आधा साल था, जिसे मैंने ढाका, बांग्लादेश में बिताया।

मेरी समूची किशोरावस्था ने मेरा परिचय दुनियाभर की संस्कृतियों, रीति-रिवाजों और नियम-कायदों से कराया। इस परिचय के लिए मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत समझती हूँ; इसी परिचय ने मुझे वह दृष्टिकोण दिया, जिसके माध्यम से मेरी समझ में आने लगा कि लोगों को अपनी ज़िन्दगी में भी वैसी ही चीज़ों के अनुभव की कामना रहती है।

अपनी कॉलेज की पढ़ाई मैंने इंग्लैंड में गिल्डफोर्ड नाम के एक छोटे-से शहर में की। वहाँ मैंने राजनीति और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। वह इंग्लैंड के एक मुख्यतः श्वेत शहर में बसे अलग-अलग तरह के छात्रों का एक घनिष्ठ समुदाय था। अपनी दुनिया के बाहर कदम रखने का यह मेरा पहला अनुभव था। कॉलेज के अपने पहले दिन मेरी मुलाकात एक संभावित नयी सहेली से हुई। हम बात करने लगे और जैसा कि कॉलेज शुरू करने वाली सभी लड़कियाँ करती हैं, हम भी बड़े-बड़े राजनीतिक मुद्दों के बारे में बात करनी लगीं। जी हाँ, मैं मज़ाक कर रही हूँ! हम भी लड़कों के ही बारे में बातें कर रही थीं। फिर अचानक उसने बड़े ही बेपरवाह ढंग से मुझसे पूछा, “तुम्हारी टाइप क्या है?” मुझे उसकी बात समझ नहीं आई तो मैंने उससे पूछा कि उसका क्या मतलब था।

तब वह बोली, “मतलब ये कि तुम्हें किस तरह के लड़के पसंद हैं? गोर, काले, भूरे?”

उसकी बात सुनकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई। मुझे समझ नहीं आया कि इसमें इतनी हैरानी वाली आख़िर कौनसी बात थी, पर शायद उसके पूछने का लहज़ा ही कुछ ऐसा रहा था। वह तो ऐसे पूछ रही थी, जैसे मुझसे जूतों का अपना पसंदीदा रंग चुनने को कह रही हो!

मैंने उसे ईमानदारी से जवाब दिया, “पता नहीं। शायद ये तो उस लड़के पर ही डिपेंड करता है। मैं चाहती हूँ कि वो फनी हो और मेरी तरह वो भी खाने-पीने का शौक़ीन हो।”

मेरे ख्याल से मेरे इस जवाब से उसे संतुष्टि नहीं हुई क्योंकि उसने यह कहकर अपनी बात ख़त्म कर दी कि शायद उसका सवाल समझने में मुझसे गलती हो गई थी। हमारी बात का टॉपिक तो बदल गया, पर उसका सवाल मेरे दिमाग में लगातार घूमता रहा। बाद में मैं इस बात पर विचार करने लगी कि वह कौनसा जवाब सुनना चाहती थी और आख़िर उस जवाब की इतनी अहमियत क्यों थी। क्या मेरे द्वारा चुनी गई “टाइप” से मेरे प्रति उसका रवैया भी बदल जाता? क्या लोग मेरे बारे में भी ऐसी ही बातें करते होंगे? मेरे बारे में वे क्या-क्या धारणाएँ बनाते होंगे? मेरे मन के लिए वह ऐसा पहला मौका था, जब किसी ने मुझसे अपने संभावित प्रेमी की पहचान करके उसके बारे में धारणा बनाने का आधार उसके रंग को बनाया था।

हम इंसानों में फर्क कम और समानताएँ ज़्यादा हैं। स्वीकृति और प्यार का हमारा साझा संघर्ष व हमारा दर्द हमें आपस में जोड़ता है। तो फिर आख़िर क्यों हम अपनी भिन्नताओं को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देते हैं? नेता और सार्वजानिक शख्सियतें हमेशा एकता का ढोल तो पीटती रहती हैं, पर क्या एकता उनके किसी काम भी आती है? यह एक बेहद दिलचस्प सवाल है कि एक कम विभाजित समाज की दिशा में कदम बढ़ाने पर सबसे ज़्यादा नुकसान किसे उठाना पड़ेगा। जी हाँ, कम विविध नहीं, बल्कि कम विभाजित। या फिर अपने विभाजनों में क्या हम इतने सहज हो गए हैं कि ऐसी दुनिया की कल्पना भी अब हमें डरावनी और ऊटपटांग लगने लगी है?

हमारे समाज को चलाने वाली मशीनें ही इन काल्पनिक दरारों को चौड़ा करती चली जाती हैं: मीडिया, पक्षपातपूर्ण राजनीति, हमारे कानूनी ढांचे, हमारी पसंदीदा फिल्में और गाने (जी हाँ, यह कहते हुए मुझे वाकई में खेद हो रहा है)। हरेक कहानी में एक नायक और एक खलनायक होता है; नायक की जीत की अहमियत खलनायक की बुराई की पृष्ठभूमि में और भी बड़ी नज़र आती है। यहाँ हमें यह सवाल करना चाहिए कि “बुरे आदमी” के तौर पर किसका चित्रण किया जा रहा है और इस चित्रण से किस विचारधारा को बल मिलता है? कुछ और नहीं तो इन काल्पनिक दरारों से श्रेष्ठता या हीनता की हमारी भावनाओं को तो बल मिलता ही है, और सबसे खराब परिस्थितियों में तो ये दरारें हमारे जीवन की दिशा को भी तय कर सकती हैं।

हरेक अन्याय के पीछे किसी गलत नैरेटिव का हाथ होता है। महिलाओं के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों की जड़ें उन विचारधाराओं में होती हैं, जो उन्हें पुरुषों से कमज़ोर करार देती हैं। रंगभेद की जड़ें उन विचारधाराओं में होती हैं, जो अश्वेतों को श्वेत लोगों से कम काबिल दर्शाती हैं। अक्सर देखने में आता है कि अन्यायों से गुज़रने वाले लोग उन्हें दबाए रखने के लिए बनाए गए नैरेटिवों को कुछ हद तक आत्मसात भी करने लगते हैं। अपनी पहचान के किसी ख़ास पहलू पर ज़ोर देकर अपने समुदाय या समूह के ऊपर थोपे गए साझे पूर्वाग्रहों की पोल खोलने में हमें मदद मिल सकती है। लेकिन यही सुरक्षा कवच हमें सीमित करने वाली उन स्थिर पहचानों से आगे बढ़ने में बाधा भी उत्पन्न कर सकता है।

मेरे पापा ने एक बार मुझसे कहा था कि, “तुममें और तुम्हारी ज़िन्दगी में आने वाले हर इंसान में तुम्हें कुछ न कुछ कॉमन ज़रूर दिखाई देगा। और अगर तुम्हें वह कॉमन चीज़ दिखाई नहीं दे रही है तो हो सकता है कि तुम ईमानदारी से कोशिश ही न कर रही हो।” अभी तक तो उनकी बात सच साबित होती दिखाई दे रही है। अगर हम अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह करें कि एक ही मूल भावना पर आधारित अलग-अलग संघर्षों से गुज़रने वाले लोगों को भी हमारी बात समझ में आ जाए, तो हो सकता है कि हमारे सामने खड़े विभाजन में भी थोड़ी कमी आ जाए। नैतिक रूप से कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से दूध का धुला नहीं हो सकता। हमारी पहचान लगातार गतिशील रहती है; हमारे रोज़मर्रा के अनुभव हमें ढालते हैं और समय के साथ-साथ हममें बदलाव लाते हैं। एकतरफ़ा, विभाजनकारी विचारधाराओं से मुंह मोड़ लें। अक्सर हम उन्हीं लोगों को अपना दुश्मन मान लेते हैं, जिनसे या तो हम सहमत नहीं होते या फिर जिन्हें हम अपने बराबर का नहीं समझते।

उनकी इंसानियत की उपेक्षा करके हम उनसे अपनी इंसानियत को पहचानने की उम्मीद आख़िर कैसे कर सकते हैं? एक्सपोज़र और सांस्कृतिक जागरूकता वे विशेषाधिकार हैं, जो हर किसी को नहीं मिलते; हमारे वैश्वीकृत जगत में यह जागरूकता एक बेहद मूल्यवान मुद्रा ही तो है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि लोगों के जीवन के अनुभव उनकी सीमाओं को परिभाषित कर सकते हैं।

मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या हम पृथ्वी के इतिहास की वह पहली प्रजाति होंगे, जिसने जानबूझकर खुद को ही बर्बाद कर डाला। हमने तो पूरी की पूरी मानव जाति का सर्वनाश करने का माद्दा रखने वाले हथियारों तक का निर्माण कर रखा है। एक बार तो मुझे ऐसा लगा, जैसे 2020 हमें उसी विनाश के मुँह में धकेल रहा था। लेकिन मुझे उम्मीद है कि अपनी शक्ति की एक दो-धारी तलवार के तौर पर पहचान करके इंसान उस विनाश से एक कदम पीछे हट सकता है।

लेकिन हमारी हालत तो मानों ऐसी है कि हम आपस में लड़ने-मरने में ही इतने मशगूल हो चुके हैं कि अपनी दहलीज़ पर खड़े बड़े-बड़े खतरे हमें दिखाई ही नहीं दे रहे। इस एकता की दिशा में अपने सफ़र की शुरुआत के लिए हम उस सबसे शक्तिशाली भाव को महसूस कर सकते हैं, जो हम सबको आपस में जोड़े रखता है: हमारा दर्द।

दर्द हमारे चारों तरफ़ मौजूद है। वह हमारे मनपसंद गानों के लिरिक्स में पिरोया होता है। वह किसी उत्तेजित बहस की आग में घी के तौर पर काम करता है। वह उन वयस्क महिलाओं और पुरुषों के दिलों में सड़ता रहता है, जिनके घाव कभी पूरी तरह से भर ही न सके। दर्द वाकई में हर जगह मौजूद है। दर्द के छोटे-छोटे डोज़ भले ही काफी अहमियत रखते हों, पर हमारी बर्दाश्त से बाहर का दर्द खुद को भयानक ढंग से व्यक्त करने की क्षमता भी रखता है। मेरा तो यहाँ तक मानना है कि यह दुनिया प्यार पर नहीं, दर्द पर चल रही है।

आज की तारीख 6 जनवरी 2021 है। इस लेख को मैं न्यू यॉर्क से लिख रही हूँ। अपनी टीवी स्क्रीन पर मैं देख रही हूँ 2020 अमेरिकी चुनाव के नतीजों से अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए वॉशिंगटन डीसी में मौजूद कैपिटल हिल पर चढ़ाई करती एक भीड़ को। पहली नज़र में तो ये एक ऐसे अत्याचारी नेता के कुछ सनकी, जातिवादी और बेरहम समर्थक दिखाई देते हैं, जिसने इन्हें देश के एक प्रतीकात्मक स्मारक पर कब्ज़ा करने के लिए प्रोत्साहित किया है। लेकिन इसपर थोड़ी गहराई से सोचती हूँ तो मुझे लगता है कि शायद एक छोटा-सा लड़का, जिसपर न तो उसकी माँ ने कभी ज़्यादा ध्यान दिया और न ही अपने पिता से उसे अपनी वांछित स्वीकृति मिली, बड़ा होकर गंभीर मनोवैज्ञानिक विकारों से त्रस्त एक गुस्सैल आदमी बन गया। नतीजतन वह एक अप्रशिक्षित अहंकार और अत्यधिक संकीर्णता को अपना बैठा।

वह आदमी, जिसमें अभी भी वह लावारिस लड़का वास करता है, स्वीकृति प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अपने बचपन में न मिले प्यार की भरपाई करने की यह आख़िर उसकी एक हताश कोशिश ही तो है। इस आदमी ने उन लोगों के दर्द को भुनाया है, जो एक ऐसे आधुनिक समाज के हाशिये पर रहते हैं, जिसमें खुद को ढाल पाने में वे नाकामयाब रहे हैं — शायद इसलिए कि उन्हें ज़रूरी एक्सपोज़र नहीं मिल सका, या फिर बदलाव के अपने डर के चलते। उनके दर्द ने नफरत में तब्दील होकर एक विनाशकारी बवंडर का रूप धारण कर लिया है, जिसने अपनी राह में और भी दर्द छोड़ दिया है। हम दर्द का मुकाबला और भी जंगली दर्द से तो नहीं कर सकते, पर दूसरों के दर्द को हम दर्द के ही एक अधिक विकसित रूप में तो देख ही सकते हैं: हमदर्दी। यह इस तरह के अनुशासनहीन बर्ताव को माफ़ करने, उसकी अनदेखी करने या फिर उसे सही ठहराने का कोई तरीका न होकर इस मत को सामने रखने का एक रास्ता है कि इस तरह की हरकतें अक्सर एक गहरे दर्द कि अभिव्यक्ति होती हैं।

लोगों को बेवकूफ या बुरा कहकर उनसे पल्ला झाड़ लेना आसान तो होता है, पर यह एक बेहद एकतरफ़ा तरीका होता है। अगर आप किसी मुद्दे को समझना चाहते हैं तो उससे जुड़े लोगों के साथ हमदर्दी रखकर देखें। खुद को उनकी जगह रखकर देखें। अपने जैसे न दिखने वाले, अपनी भाषा न बोलने वाले या फिर अपने विचारों से मतभेद रखने वालों से फासले बनाना तो आसान होता है, पर एक इंसान के तौर पर उनकी शिकायतों पर गौर करना ज़रा मुश्किल। एक देश से दूसरे देश जा बसने वाले एक इंसान के तौर पर जो एक बात मेरे सामने साफ़ है, वह यह कि हमारी समानताएँ हमारे भेदों से कहीं ज़्यादा हैं। अगर आप किसी देश को समझना चाहते हैं तो उस देश के लोगों के लिए हमदर्दी रखना सीखें। अगर आप किसी समुदाय में कोई बदलाव लाना चाहते हैं तो उसके अंदर वास करने वालों की इंसानियत की पहचान करना सीखें। किसी विभाजित समुदाय की हम तब तक निंदा नहीं कर सकते, जब तक कि उस विभाजन की दरारों को चौड़ा करने में अपनी भूमिका की हम ज़िम्मेदारी नहीं ले लेते।

हम क्या नहीं हैं, इसे स्पष्ट करके ही हम यह परिभाषित करते हैं कि हम क्या हैं। एक इंसान के तौर पर शायद अपनी पहचान परिभाषित करने की शुरुआत हम अपने साझे अनुभवों को अंगीकार करके ही कर सकते हैं।

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